Short Moral Story in Hindi | बच्चों के लिए प्रेरणादायक कहानियाँ

आज मै अपने TheHindiAdda के इस आर्टिकल में कुछ प्रमुख moral story लेकर आया हूँ। ये सभी Short Moral Story in Hindi में है। सभी Moral of story बच्चों kids के साथ साथ adults को ध्यान में रख कर लिखा गया है। आप इसे बच्चों के लिए प्रेरणादायक कहानियाँ के रूप में सुना सकते हैं.

Moral Story in Hindi ~ Best Hindi Inspiring Stories for Students Children and Adult youth.

Short Moral Story in Hindi | बच्चों के लिए प्रेरणादायक कहानियाँ

1. सोच बदलो, जिंदगी बदल जायेगी ~ Moral Story

एक गाँव में सूखा पड़ने की वजह से गाँव के सभी लोग बहुत परेशान थे, उनकी फसले खराब हो रही थी, बच्चे भूखे-प्यासे मर रहे थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था की इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जाय। उसी गाँव में एक विद्वान महात्मा रहते थे। गाँव वालो ने निर्णय लिया उनके पास जाकर इस समस्या का समाधान माँगने के लिये, सब लोग महात्मा के पास गये और उन्हें अपनी सारी परेशानी विस्तार से बतायी, महात्मा ने कहा कि आप सब मुझे एक हफ्ते का समय दीजिये मैं आपको कुछ समाधान ढूँढ कर बताता हूँ।

गाँव वालो ने कहा ठीक है और महात्मा के पास से चले गये। एक हफ्ते बीत गये लेकिन साधू महात्मा कोई भी हल ढूँढ न सके और उन्होंने गाँव वालो से कहा कि अब तो आप सबकी मदद केवल ऊपर बैठा वो भगवान ही कर सकता है। अब सब भगवान की पूजा करने लगे भगवान को खुश करने के लिये, और भगवान ने उन सबकी सुन ली और उन्होंने गाँव में अपना एक दूत भेजा। गाँव में पहुँचकर दूत ने सभी गाँव वालो से कहा कि “आज रात को अगर तुम सब एक-एक लोटा दूध गाँव के पास वाले उस कुवे में बिना देखे डालोगे तो कल से तुम्हारे गाँव में घनघोर बारिश होगी और तुम्हारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी।

इतना कहकर वो दूत वहा से चला गया। गाँव वाले बहुत खुश हुए और सब लोग उस कुवे में दूध डालने के लिये तैयार हो गये लेकिन उसी गाँव में एक कंजूस इंसान रहता था उसने सोचा कि सब लोग तो दूध डालेगें ही अगर मैं दूध की जगह एक लोटा पानी डाल देता हूँ तो किसको पता चलने वाला है। रात को कुवे में दूध डालने के बाद सारे गाँव वाले सुबह उठकर बारिश के होने का इंतेजार करने लगे लेकिन मौसम वैसा का वैसा ही दिख रहा था और बारिश के होने की थोड़ी भी संभावना नहीं दिख रही थी।

देर तक बारिश का इंतेजार करने के बाद सब लोग उस कुवे के पास गये और जब उस कुवे में देखा तो कुवा पानी से भरा हुआ था और उस कुवे में दूध का एक बूंद भी नहीं था। सब लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे और समझ गये कि बारिश अभी तक क्यों नहीं हुई। और वो इसलिये क्योँकि उस कंजूस व्यक्ति की तरह सारे गाँव वालो ने भी यही सोचा था कि सब लोग तो दूध डालेगें ही, मेरे एक लोटा पानी डाल देने से क्या फर्क पड़ने वाला है। और इसी चक्कर में किसी ने भी कुवे में दूध का एक बूँद भी नहीं डाला और कुवे को पानी से भर दिया।

Moral of the Story

Same तरह की गलती आज कल हम अपने real life में भी करते रहते हैं, हम सब सोचते है कि हमारे एक के कुछ करने से क्या होने वाला है लेकिन हम ये भूल जाते है कि “बूंद-बूंद से सागर बनता है।“ अगर आप अपने देश, समाज, घर में कुछ बदलाव लाना चाहते हैं, कुछ बेहतर करना चाहते हैं तो खुद को बदलिये और बेहतर बनायिये बाकी सब अपने आप हो जायेगा जायेगा।

2. कठिन बहुत है, असंभव नहीं ~ Moral Story

यदि आप में कलाकारी है, तो किसी अपने को, जीवन भर अपना बनाए रखें। कठिन बहुत है, असंभव नहीं।
प्रायः सभी लोग स्वयं को बहुत बुद्धिमान मानते हैं। बहुत बड़ा कलाकार मानते हैं। अपनी कलाकारी को सिद्ध करने के लिए वे दिन भर ऐसे प्रयास भी करते रहते हैं। जैसे किसी की खिल्ली उड़ाते हैं, किसी को बदनाम करते हैं, किसी पर झूठा आरोप लगाते हैं, किसी का दोष उछालते हैं। अपने गुणों का व्याख्यान करते हैं, अपनी बुद्धिमत्ता के किस्से सुनाते रहते हैं। बहुत कुछ अपने विषय में अतिशयोक्ति भी करते रहते हैं, इत्यादि।

इन सब कार्यों से वे दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं। और ऐसा प्रभावित करना चाहते हैं कि दूसरे लोग उनको बहुत ऊंचा व्यक्ति मानें। उनके साथ जुड़े रहें। जब कि होता है इससे उल्टा। ऐसे अनुचित कार्यों से लोग, ऐसे कार्य करने वाले से डरते हैं, दबते हैं, परंतु उनके प्रति श्रद्धालु नहीं होते। उनको कोई ऊंचा कलाकार नहीं मानते। बल्कि दुष्ट बेईमान चालाक अवसरवादी ब्लैकमेलर आदि इस रूप में देखते हैं। यदि आप किसी को प्रभावित करना चाहते हैं तो ईश्वरीय उत्तम गुणों = सेवा नम्रता सभ्यता सहयोग आस्तिकता सम्मान देना आदि के द्वारा आप ठीक प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं।

किसी को इन ईश्वरीय गुणों और योग्यता से प्रभावित करना तथा लंबे समय तक प्रभावित किए रखना, उसको अपने साथ जोड़े रखना, बहुत कठिन कार्य है। असंभव तो नहीं है, परंतु कठिन बहुत है।
क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के साथ संबंध जोड़ता है, तो वह तभी संबंध जोड़ता है, जब उसे दूसरे व्यक्ति से संबंध बनाए रखने में कुछ लाभ दिखाई दे।

कुछ प्रेम मिले, कुछ सहयोग मिले, सम्मान मिले, आनन्द मिले, सहानुभूति मिले, और समय पड़ने पर आर्थिक सहायता भी मिले। कुछ अन्य प्रकार की सुविधाएं भी मिलें। तब व्यक्ति, किसी दूसरे के साथ संबंध जोड़ना चाहता है।
और इसमें सबसे बड़ा आधार यह है कि जब तक दो व्यक्तियों के विचार आपस में मिलते हैं, तब तक उनका संबंध बना रहेगा। जैसे ही विचारों में टकराव होगा, वैसे ही संबंध में कमी आनी आरंभ हो जाएगी।
अब आप विचार कीजिए, क्या किन्हीं दो व्यक्तियों के विचार जीवनभर 100% एक जैसे बने रह सकते हैं? आप कहेंगे – नहीं।

तो जहाँ से भी विचारों में टकराव आरंभ होगा, वहीं से दूरियां बढ़ने लगेंगी। और यदि विचारभेद लंबे समय तक बना रहा, तो धीरे-धीरे वह संबंध कमजोर होता जाएगा। यदि विचारों का टकराव बना ही रहा, कम नहीं हुआ, तो हो सकता है आगे चलकर संबंध टूट भी जाए।

Moral of the Story

यदि वे दोनों व्यक्ति बुद्धिमान हों, एक दूसरे के विचारों को ठीक से समझ कर अपना विचारभेद कम करते जाएं, तो उनका संबंध नहीं टूटेगा। जीवन भर भी वे आपस में संगठित होकर आनंदपूर्वक जी सकेंगे।
इस प्रकार से जो व्यक्ति विचारों का तालमेल बिठाने की कला जानता है, बस वही वास्तविक कलाकार है। वही किसी अपने को जीवनभर अपना बनाए रखेगा। आप भी ऐसी कलाकारी अपने अंदर उत्पन्न करने का प्रयत्न करें, और असली कलाकार बनें।

3. दादी लस्सी पियोगी ~ Moral Story

गाजियाबाद में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया :

“दादी लस्सी पियोगी ??”

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए *हुए 6-7 रुपए थे, वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा:

“ये किस लिए..??”

“इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !!”

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था.. रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा.. उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.. कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये.. लेकिन वो कुर्सी जिस पर मैं बैठा था, मुझे काट रही थी..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था…इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी… हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा.. लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा :

“ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं, किन्तु इंसान तो कभी-कभार ही आता है।

4. ईर्ष्या और हमारा जीवन ~ Moral Story

एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से कहा कि वे कल प्रवचन में अपने साथ एक थैली में कुछ आलू भरकर लाएं। साथ ही निर्देश भी दिया कि उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। अगले दिन किसी शिष्य ने चार आलू, किसी ने छह तो किसी ने आठ आलू लाए। प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफरत करते थे।

अब महात्मा जी ने कहा कि अगले सात दिनों तक आपलोग ये आलू हमेशा अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन सबने आदेश का पालन किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों को कष्ट होने लगा। जिनके पास ज्यादा आलू थे, वे बड़े कष्ट में थे। किसी तरह उन्होंने सात दिन बिताए और महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा ने कहा, ‘अब अपनी-अपनी थैलियां निकाल कर रख दें।’ शिष्यों ने चैन की सांस ली। महात्मा जी ने विगत सात दिनों का अनुभव पूछा। शिष्यों ने अपने कष्टों का विवरण दिया। उन्होंने आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया। सभी ने कहा कि अब बड़ा हल्का महसूस हो रहा है।…

महात्मा ने कहा, ‘जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफरत करते हैं, आपके मन पर उनका कितना बड़ा बोझ रहता होगा। और उसे आप जिंदगी भर ढोते रहते हैं। सोचिए, ईर्ष्या के बोझ से आपके मन और दिमाग की क्या हालत होती होगी?

Moral of the Story

ईर्ष्या के अनावश्यक बोझ के कारण आपलोगों के मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो। यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत मत करो। आपका मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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5. चापलूसी ~ Moral Story

सेठ पुरूषोत्तमदास शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। जिन्होंने कड़ी मेहनत एवं परिश्रम से अपने उद्योग का निर्माण किया था। उनका एकमात्र पुत्र राकेश अमेरिका से पढ़कर वापिस आ गया था और उसके पिताजी ने सारी जवाबदारी उसे सौंप दी थी। राजेश होशियार एवं परिश्रमी था, परंतु चाटुरिकता को नहीं समझ पाता था। वह सहज ही सब पर विश्वास कर लेता था।

उसने उद्योग के संचालन में परिवर्तन लाने हेतु उस क्षेत्र के पढ़े लिखे डिग्रीधारियों की नियुक्ति की, उसके इस बदलाव से पुराने अनुभवी अधिकारीगण अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे। नये अधिकारियों ने कारखाने में नये उत्पादन की योजना बनाई एवं राकेश को इससे होने वाले भारी मुनाफे को बताकर सहमति ले ली। इस नये उत्पादन में पुराने अनुभवी अधिकारियों को नजरअंदाज किया गया।

इस उत्पादन के संबंध में पुराने अधिकारियों ने राकेश को आगाह किया था कि इन मशीनों से उच्च गुणवत्ता वाले माल का उत्पादन करना संभव नहीं है। नये अधिकारियों ने अपनी लुभावनी एवं चापलूसी पूर्ण बातों से राकेश को अपनी बात का विश्वास दिला दिया। कंपनी की पुरानी साख के कारण बिना सेम्पल देखे ही करोंडो का आर्डर बाजार से प्राप्त हो गया। यह देख कर राकेश एवं नये अधिकारीगण संभावित मुनाफे को सोचकर फूले नहीं समा रहे थे।

जब कारखाने में इसका उत्पादन किया गया तो माल उस गुणवत्ता का नहीं बना जो बाजार में जा सके। सारे प्रयासों के बावजूद भी माल वैसा नहीं बन पा रहा था जैसी उम्मीद थी और नये अधिकारियों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये थे। उनमें से कुछ ने तो यह परिणाम देखकर नौकरी छोड़ दी। राकेश अत्यंत दुविधापूर्ण स्थिति में था। यदि अपेक्षित माल नहीं बनाया गया तो कंपनी की साख पर कलंक लग जाएगा। अब उसे नये अधिकारियों की चापलूसी भरी बातें कचोट रही थी।

राकेश ने इस कठिन परिस्थिति में भी धैर्य बनाए रखा तथा अपने पुराने अधिकारियों की उपेक्षा के लिए माफी माँगते हुए, अब क्या किया जाए इस पर विचार किया। सभी अधिकारियों ने एकमत से कहा कि कंपनी की साख को बचाना हमारा पहला कर्तव्य है अतः इस माल के निर्माण एवं समय पर भेजने हेतु हमें उच्च स्तरीय मशीनरी की आवश्यकता है, अगर यह ऊँचे दामों पर भी मिले तो भी हमें तुरंत उसे खरीदना चाहिये। राकेश की सहमति के उपरांत विदेशों से सारी मशीनरी आयात की गई एवं दिनरात एक करके अधिकारियों एवं श्रमिकों ने माल उत्पादन करके नियत समय पर बाजार में पहुँचा दिया।

Moral of the Story

इस सारी कवायद से कंपनी को मुनाफा तो नहीं हुआ परंतु उसकी साख बच गई जो कि किसी भी उद्योग के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। राकेश को भी यह बात समझ आ गई कि अनुभव बहुत बड़ा गुण है एवं चापलूसी की बातों में आकर अपने विवेक का उपयोग न करना बहुत बड़ा अवगुण है और हमें अपने पुराने अनुभवी व्यक्तियों को कभी भी नजर अंदाज नहीं करना चाहिये क्योंकि व्यवसाय का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं होता यदि व्यवसाय को भावना से जोड़ दिया जाये तो इसका प्रभाव और गहरा होता है।

6. सुख-दुख ~ Moral Story

हम होते ही कौन हैं , मालिक के काम में दखलअंदाज़ी करने वाले ….
जो कुछ हो रहा है , उस मालिक की मर्ज़ी से ही तो हो रहा है ..
इसलिये कभी जीवन में दुःख भी आ जायें तो चिन्ता नहीं करनी चाहिये ..
क्योंकि उसकी ☝🏻गत वो ही जाने , न जाने कौन से कर्म कटवाने होंगे , कौनसा लेनदेन चुकता करना होगा , हमें क्या खबर ?
इसलिये मालिक की रज़ा में राज़ी रहने में ही समझदारी है ..
मालिक के भाणे में रहना सीखें हम लोग …और बाकी सब कुछ उस परमपिता परमात्मा पर छोड़ दें , विश्वास रखें बस … अपने विश्वास को डगमगाने बिल्कुल ना दें … फिर देखें कि कैसे हमें मालिक इन दुःखों को सहन करने शक्ति हमें बख्शते हैं …
सहनशक्ति तो क्या मालिक इन दुःखों को कैसे पहाड़ से राई में तब्दील कर देते हैं , हमें पता तक नहीं चलता …
बस जरूरत है अटूट विश्वास और सच्ची सेवा की , जिसकी ओर तो हम लोगों का बहुत कम ध्यान जाता है ….
इसलिये हम लोग ये प्रण करें कि उठते-बैठते , सोते-जागते ,चलते-फिरते , खाते-पीते , काम-काज करते , कभी-भी , कहीं-भी अपनी असली कमाई यानी सिमरन-भजन की ओर ध्यान दें ….ना कि बाकी की फालतू और बेमतलब की चीज़ों की ओर…
फिर देखें कि सच्चा सुख क्या होता है..!!

7. ऎसा भी प्रेम… ~ Moral Story

एक साधू बहुत दिनों तक राजा के साथ रहा। राजा का बहुत प्रेम उस साधु पर हो गया। प्रेम भी इतना कि राजा रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

एक दिन दोनों जंगल गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। राजा ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। राजा ने फल के छह टुकड़े किए और पहला टुकड़ा साधु को दिया।
साधु ने टुकड़ा खाया और बोला, ‘बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया।

एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी साधु को मिल गया। साधु ने एक टुकड़ा और राजा से मांग लिया। इसी तरह साधु ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब साधु ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो राजा ने कहा, ‘यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।’

और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, ‘तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?’ उस साधु का उत्तर था, ‘जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। ऎसा व्यक्ति जो होगा, वही संतुष्ट हो सकता है। संतोष का भी अपना गणित है। अपनी कैमिस्ट्री है।

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8. सही दिशा ~ Moral Story

एक पहलवान जैसा, हट्टा-कट्टा, लंबा-चौड़ा व्यक्ति सामान लेकर किसी स्टेशन पर उतरा। उसनेँ एक टैक्सी वाले से कहा कि मुझे साईँ बाबा के मंदिर जाना है। टैक्सी वाले नेँ कहा- 200 रुपये लगेँगे। उस पहलवान आदमी नेँ बुद्दिमानी दिखाते हुए कहा- इतने पास के दो सौ रुपये, आप टैक्सी वाले तो लूट रहे हो। मैँ अपना सामान खुद ही उठा कर चला जाऊँगा। वह व्यक्ति काफी दूर तक सामान लेकर चलता रहा।

कुछ देर बाद पुन: उसे वही टैक्सी वाला दिखा, अब उस आदमी ने फिर टैक्सी वाले से पूछा- भैया अब तो मैने आधा से ज्यादा दुरी तर कर ली है तो अब आप कितना रुपये लेँगे? टैक्सी वाले नेँ जवाब दिया- 400 रुपये। उस आदमी नेँ फिर कहा- पहले दो सौ रुपये, अब चार सौ रुपये, ऐसा क्योँ। टैक्सी वाले नेँ जवाब दिया- महोदय, इतनी देर से आप साईँ मंदिर की विपरीत दिशा मेँ दौड़ लगा रहे हैँ जबकि साईँ मँदिर तो दुसरी तरफ है। उस पहलवान व्यक्ति नेँ कुछ भी नहीँ कहा और चुपचाप टैक्सी मेँ बैठ गया।

शिक्षा:-
इसी तरह जिँदगी के कई मुकाम मेँ हम किसी चीज को बिना गंभीरता से सोचे सीधे काम शुरु कर देते हैँ, और फिर अपनी मेहनत और समय को बर्बाद कर उस काम को आधा ही करके छोड़ देते हैँ। किसी भी काम को हाथ मेँ लेनेँ से पहले पुरी तरह सोच विचार लेवेँ कि क्या जो आप कर रहे हैँ वो आपके लक्ष्य का हिस्सा है कि नहीँ। हमेशा एक बात याद रखेँ कि दिशा सही होनेँ पर ही मेहनत पूरा रंग लाती है और यदि दिशा ही गलत हो तो आप कितनी भी मेहनत का कोई लाभ नहीं मिल पायेगा। इसीलिए दिशा तय करेँ और आगे बढ़ेँ कामयाबी आपके हाथ जरुर थामेगी।

9. कर्म भोग ~ Moral Story

एक गाँव में एक किसान रहता था उसके परिवार में उसकी पत्नी और एक लड़का था। कुछ सालों के बाद पत्नी की मृत्यु हो गई उस समय लड़के की उम्र दस साल थी। किसान ने दूसरी शादी कर ली। उस दूसरी पत्नी से भी किसान को एक पुत्र प्राप्त हुआ। किसान की दूसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई। किसान का बड़ा बेटा जो पहली पत्नी से प्राप्त हुआ था जब शादी के योग्य हुआ तब किसान ने बड़े बेटे की शादी कर दी। फिर किसान की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई।

किसान का छोटा बेटा जो दूसरी पत्नी से प्राप्त हुआ था और पहली पत्नी से प्राप्त बड़ा बेटा दोनों साथ साथ रहते थे। कुछ समय बाद किसान के छोटे लड़के की तबियत खराब रहने लगी। बड़े भाई ने कुछ आस पास के वैद्यों से इलाज करवाया पर कोई राहत ना मिली। छोटे भाई की दिन ब दिन तबियत बिगड़ती जा रही थी और बहुत खर्च भी हो रहा था। एक दिन बड़े भाई ने अपनी पत्नी से सलाह की कि यदि ये छोटा भाई मर जाए तो हमें इसके इलाज के लिए पैसा खर्च ना करना पड़ेगा। और जायदाद में आधा हिस्सा भी नहीं देना पड़ेगा। तब उसकी पत्नी ने कहा कि क्यों न किसी वैद्य से बात करके इसे जहर दे दिया जाए किसी को पता भी ना चलेगा किसी रिश्तेदारी में भी कोई शक ना करेगा कि बीमार था बीमारी से मृत्यु हो गई।

बड़े भाई ने ऐसे ही किया एक वैद्य से बात की कि आप अपनी फीस बताओ ऐसा करना मेरे छोटे बीमार भाई को दवा के बहाने से जहर देना है ! वैद्य ने बात मान ली और लड़के को जहर दे दिया और लड़के की मृत्यु हो गई। उसके भाई भाभी ने खुशी मनाई की रास्ते का काँटा निकल गया अब सारी सम्पत्ति अपनी हो गई। उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। कुछ महीनों पश्चात उस किसान के बड़े लड़के की पत्नी को लड़का हुआ ! उन पति पत्नी ने खूब खुशी मनाई, बड़े ही लाड़ प्यार से लड़के की परवरिश की। कुछ ही गिने वर्षों में लड़का जवान हो गया। उन्होंने अपने लड़के की भी शादी कर दी! शादी के कुछ समय बाद अचानक लड़का बीमार रहने लगा।

माँ बाप ने उसके इलाज के लिए बहुत वैद्यों से इलाज करवाया। जिसने जितना पैसा माँगा दिया सब कुछ दिया ताकि लड़का ठीक हो जाए । अपने लड़के के इलाज में अपनी आधी सम्पत्ति तक बेच दी पर लड़का बीमारी के कारण मरने की कगार पर आ गया। शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो गया की अस्थि-पिंजर शेष रह गया था। एक दिन लड़के को चारपाई पर लेटा रखा था और उसका पिता साथ में बैठा अपने पुत्र की ये दयनीय हालत देख कर दुःखी होकर उसकी ओर देख रहा था! तभी लड़का अपने पिता से बोला कि भाई! अपना सब हिसाब हो गया बस अब कफन और लकड़ी का हिसाब बाकी है उसकी तैयारी कर लो। ये सुनकर उसके पिता ने सोचा की लड़के का दिमाग भी काम नहीं कर रहा है बीमारी के कारण और बोला बेटा मैं तेरा बाप हूँ भाई नहीं!

तब लड़का बोला मैं आपका वही भाई हूँ जो आप ने जहर खिलाकर मरवाया था। जिस सम्पत्ति के लिए आप ने मरवाया था मुझे अब वो मेरे इलाज के लिए आधी बिक चुकी है आपकी शेष है हमारा हिसाब हो गया! तब उसका पिता फ़ूट-फूट कर रोते हुए बोला कि मेरा तो कुल नाश हो गया। जो किया मेरे आगे आ गया। पर तेरी पत्नी का क्या दोष है जो इस बेचारी को जिन्दा जलाया जाएगा। (उस समय सतीप्रथा थी जिसमें पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था) तब वो लड़का बोला की वो वैद्य कहाँ है, जिसने मुझे जहर खिलाया था। तब उसके पिता ने कहा की आप की मृत्यु के तीन साल बाद वो मर गया था। तब लड़के ने कहा कि ये वही दुष्ट वैद्य आज मेरी पत्नी रूप में है मेरे मरने पर इसे जिन्दा जलाया जाएगा।

Moral of the Story

हमारा जीवन जो उतार-चढ़ाव से भरा है इसके पीछे हमारे अपने ही कर्म होते हैं। हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटना पड़ेगा। कर्म करो तो फल मिलता है, आज नहीं तो कल मिलता है। जितना गहरा अधिक हो कुआँ, उतना मीठा जल मिलता है। जीवन के हर कठिन प्रश्न का, जीवन से ही हल मिलता है!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

10. नकलची ~ Moral Story

दुबई के एक रेस्टारेंट में, मैं अपने मित्र रमेश के साथ बैठा हुआ अपने छात्र जीवन की भूली बिसरी यादों के बारे में बातें कर रहे थे। उसे वह दिन अच्छे से याद था जब परीक्षा में अधिकांश छात्र नकल कर रहे थे और वह नकल ना करने के सिद्धांत पर अडिग था। उसका सोचना था कि नकल करके पास होने से अच्छा तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना है और दुर्भाग्यवश ऐसा ही हुआ वह वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया। उसने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर मन लगाकर अध्ययन करना प्रारंभ किया। इसके बाद वह आगे की कक्षाओं में हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता गया। अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद वह दुबई आ गया और अपनी ईमानदारी और कठोर परिश्रम से आज वहाँ की एक विख्यात कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है।

वह आज भी कहता है यदि मैं उस दिन नकल करके पास हो जाता तो जीवन में इतनी तरक्की नहीं कर पाता क्योंकि वह नकल करना मेरी आदत बनकर स्वभाव में आ जाती और मेरा बौद्धिक विकास एवं नैतिक चरित्र अवरूद्ध हो जाता। उसे आज भी अपने पिंटू सर की बातें याद है। वे कहा करते थे कि नकल करने में भी अक्ल की जरूरत होती है। एक बार परीक्षा में पंडित जवाहरलाल नेहरू की जीवनी पर प्रश्न आया तो एक नकलची ने उनकी जगह पर महात्मा गांधी की जीवनी लिख दी।

कोई भी नकल क्यों करता है क्योंकि पढ़ाई करने में उसका मन नहीं लगता है और परीक्षा में पास होना चाहता है नकल करके पास हुआ जा सकता है परंतु आज तक कोई भी नकल करके प्रथम श्रेणी प्राप्त नहीं कर सका है। ऐसा व्यक्तित्व जीवन के वास्तविक धरातल पर आने वाली कठिनाईयों से जूझने में असफल रहता है। इसलिये हमेशा ध्यान रखना कि जीवन में नकल करके पास होने से अच्छा तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होकर पुनः प्रयास करना है।

Moral of the Story

यही जीवन की सफलता का मूलमंत्र है। जीवटता एवं जिजिविषा के साथ संघर्ष करें, आगे बढ़े और अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।

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11. पूर्णता का अहंकार ~ Moral Story

बाप ने बेटे को भी मूर्तिकला ही सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेचकर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपए की बिकती पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य आठ-दस आने से अधिक न मिलता।हाट से लौटने पर बेटे को पास बिठाकर बाप उसकी मूर्तियों में रही हुई त्रुटियों को समझाता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए समझाता।

यह क्रम वर्षों चलता रहा। लड़का समझदार था, उसने पिता की बातें ध्यान से सुनी और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा कुछ समय बाद लड़के की मूर्तियाँ भी डेढ़ रुपए की बिकने लगीं।बाप अब भी उसी तरह समझाता और मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता। बेटे ने और भी अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी। मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपए की बिक ने लगी। सुधार के लिए समझाने का क्रम बाप तो तब भी बंद न किया एक दिन बेटे ने झुँझला कर कहा-आप तो दोष निकालने की बात बंद ही नहीं करते मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है

मुझे पाँच रुपए मिलते हैं जब किआपको दो रुपए बाप ने कहा-पुत्र जब मैं तुम्हारी उम्र का था तब मुझेअपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गईऔर दो रुपए सेअधिक मूल्य की मूर्तियाँ न बना सका मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम सदा जारी रखो ताकि बहुमूल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रेणी में पहुँच सको

12. समुद्र चोर है ~ Moral Story

समुद्र के किनारे एक लहर आई। वो एक बच्चे की चप्पल अपने साथ बहा ले गई। बच्चा ने रेत पर अंगुली से लिखा- “समुद्र चोर है।”

उसी समुद्र के दूसरे किनारे पर कुछ मछुआरों ने बहुत सारी मछली पकड़ी। एक मछुआरे ने रेत पर लिखा- “समुद्र मेरा पालनहार है।”

एक युवक समुद्र में डूब कर मर गया। उसकी मां ने रेत पर लिखा- “समुद्र हत्यारा है।”

दूसरे किनारे पर एक गरीब बूढ़ा, टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था। उसे एक बड़ी सीप में अनमोल मोती मिला। उसने रेत पर लिखा- “समुद्र दानी है।”

अचानक एक बड़ी लहर आई और सारे लिखे को मिटा कर चली गई।

लोग समुद्र के बारे में जो भी कहें, लेकिन विशाल समुद्र अपनी लहरों में मस्त रहता है। अपना उफान और शांति वह अपने हिसाब से तय करता है।
अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी के निर्णय पर अपना ध्यान ना दें।जो करना है अपने हिसाब से करें।
हार-जीत, खोना-पाना, सुख-दुख इन सबके चलते मन विचलित ना करें। अगर जिंदगी सुख शांति से ही भरी होती तो आदमी जन्म लेते समय रोता नहीं। जन्म के समय रोना और मरकर रुलाना इसी के बीच के संघर्ष भरे समय को जिंदगी कहते है..!!

13. दरिद्र ब्राह्मण ~ Moral Story

एक दरिद्र ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजर रहा था, बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया, किन्तु उस नगर मे किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अन्न नहीं दिया।

आखिर दोपहर हो गयी ,तो ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा था, सोच रहा था “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक नहीं मिला ? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक नहीं मिला ?

इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस ब्राहम्ण पर पड़ी ,उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली, वे बड़े पहुँचे हुए संत थे ,उन्होंने कहाः “हे दरिद्र ब्राह्मण तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”

यह सुनकर ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है”

महात्मा बोले, “नहीं ब्राह्मण मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं ,अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब से ही जी रहे हैं। कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की योनी से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है ,उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है, किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है ,और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता। “दूसरे में भी मेरा प्रभु ही है” यह ज्ञान नहीं होता। तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है”।

ब्राह्मण का चेहरा दुःख व निराशा से भरा था। सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण, मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है”

वह दरिद्र ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया और योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः

‘ओहोऽऽऽऽ….वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है तो कोई बघेरा है। आकृति तो मनुष्य की है ,लेकिन संस्कार पशुओं के हैं, मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं’। घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है, ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उस में मनुष्यत्व का निखार पाया।

ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है ,औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ ,मुझे बड़ी भूख लगी है ,इसीलिए मैं तुझसे माँगता हूँ ,क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है”

उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु, आप भूखे हैं ? हे मेरे भग्वन आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”

यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर (रेज़गारी) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हलवाई भाई, मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ”

यह कहकर मोची भागा,और घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया, एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया।

उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था, उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं, किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया, दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो राजा मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः

“अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा ,और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा।”

दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था। मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया। राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी। राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ ,किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”

मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है”

मोची को बुलाया गया। उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली। राजा ने कहाः

“जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं है,पाँच सौ रूपयों वाली जूती है। जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो!”

मोची बोलाः “राजा जी, तनिक ठहरिये, यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ”मोची जाकर विनयपूर्वक उस ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा जी, यह जूती इन्हीं की है।

”राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इस की जूती कैसे ?”राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं तो ब्राह्मण हूँ, यात्रा करने निकला हूँ”

राजाः “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?”

मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मण देव की होगी। जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ। न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ?

इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं। हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया!”

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?

”ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली बात बताई, और कहा कि राजन्, आप के राज्य में पशुओं के दर्शन तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का अंश इन मोची भाई में ही नज़र आया।

”राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें।”राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारियों में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ। राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर! उस के आश्चर्य की सीमा न रही, ‘ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ।’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है, वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”

ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।”श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते।

ब्राह्मण ने आगे कहाः “राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है। व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है।

एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है ,लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है।”अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है ,और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हममें मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ?

गोस्वामी तुलसीदाज जी ने कहा हैः

बिगड़ी जनम अनेक की, सुधरे अब और आजु।
तुलसी होई राम को, रामभजि तजि कुसमाजु।।

कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे। अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा। यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे। पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा अतः पशुत्व के संस्कारों को आप बाहर निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है हरि नाम संकीर्तन व सत्संग से!तो हे आत्म जनों, मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है।बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है..!!

14. राजा का ऐलान ~ Moral Story

एक राजा ने यह ऐलान करवा दिया कि कल सुबह जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस शख़्स ने भी महल में जिस चीज़ को हाथ लगा दिया वह चीज़ उसकी हो जाएगी।
इस ऐलान को सुनकर सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं तो सबसे क़ीमती चीज़ को हाथ लगाऊंगा।
कुछ लोग कहने लगे मैं तो सोने को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग चांदी को तो कुछ लोग कीमती जेवरात को, कुछ लोग घोड़ों को तो कुछ लोग हाथी को, कुछ लोग दुधारू गाय को हाथ लगाने की बात कर रहे थे।

जब सुबह महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद चीज़ों के लिये दौड़ने लगे।
सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद चीज़ों को हाथ लगा दूँ ताकि वह चीज़ हमेशा के लिए मेरी हो जाऐ।
राजा अपनी जगह पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था।
उसी समय उस भीड़ में से एक शख्स राजा की तरफ बढ़ने लगा और धीरे-धीरे चलता हुआ राजा के पास पहुँच कर उसने राजा को छू लिया।

राजा को हाथ लगाते ही राजा उसका हो गया और राजा की हर चीज भी उसकी हो गयी।
जिस तरह राजा ने उन लोगों को मौका दिया और उन लोगों ने गलतियां की।
ठीक इसी तरह सारी दुनियाँ का मालिक भी हम सबको हर रोज़ मौक़ा देता है, लेकिन अफ़सोस हम लोग भी हर रोज़ गलतियां करते हैं।
हम प्रभु को पाने की बजाए उस परमपिता की बनाई हुई दुनियाँ की चीजों की कामना करते हैं। लेकिन कभी भी हम लोग इस बात पर गौर नहीं करते कि क्यों न दुनियां के बनाने वाले प्रभु को पा लिया जाए
अगर प्रभु हमारे हो गए तो उसकी बनाई हुई हर चीज भी हमारी हो जाएगी!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

Moral Story for Kids

15. गुलामी की सीख ~ Moral Story

दास प्रथा के दिनों में एक मालिक के पास अनेकों गुलाम हुआ करते थे। उन्हीं में से एक था लुक़मान। लुक़मान था तो सिर्फ एक गुलाम लेकिन वह बड़ा ही चतुर और बुद्धिमान था। उसकी ख्याति दूर दराज़ के इलाकों में फैलने लगी थी। एक दिन इस बात की खबर उसके मालिक को लगी, मालिक ने लुक़मान को बुलाया और कहा- सुनते हैं, कि तुम बहुत बुद्धिमान हो। मैं तुम्हारी बुद्धिमानी की परीक्षा लेना चाहता हूँ।

अगर तुम इम्तिहान में पास हो गए तो तुम्हें गुलामी से छुट्टी दे दी जाएगी। अच्छा जाओ, एक मरे हुए बकरे को काटो और उसका जो हिस्सा बढ़िया हो, उसे ले आओ। लुक़मान ने आदेश का पालन किया और मरे हुए बकरे की जीभ लाकर मालिक के सामने रख दी। कारण पूछने पर कि जीभ ही क्यों लाया ! लुक़मान ने कहा- अगर शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा-ही-अच्छा होता है। मालिक ने आदेश देते हुए कहा- “अच्छा! इसे उठा ले जाओ और अब बकरे का जो हिस्सा बुरा हो उसे ले आओ।”

लुक़मान बाहर गया, लेकिन थोड़ी ही देर में उसने उसी जीभ को लाकर मालिक के सामने फिर रख दिया। फिर से कारण पूछने पर लुक़मान ने कहा- “अगर शरीर में जीभ अच्छी नहीं तो सब बुरा-ही-बुरा है। “उसने आगे कहते हुए कहा- “मालिक! वाणी तो सभी के पास जन्मजात होती है, परन्तु बोलना किसी-किसी को ही आता है…क्या बोलें? कैसे शब्द बोलें, कब बोलें। इस एक कला को बहुत ही कम लोग जानते हैं। एक बात से प्रेम झरता है और दूसरी बात से झगड़ा होता है।

कड़वी बातों ने संसार में न जाने कितने झगड़े पैदा किये हैं। इस जीभ ने ही दुनिया में बड़े-बड़े कहर ढाये हैं। जीभ तीन इंच का वो हथियार है जिससे कोई छः फिट के आदमी को भी मार सकता है तो कोई मरते हुए इंसान में भी प्राण फूंक सकता है । संसार के सभी प्राणियों में वाणी का वरदान मात्र मानव को ही मिला है। उसके सदुपयोग से स्वर्ग पृथ्वी पर उतर सकता है और दुरूपयोग से स्वर्ग भी नरक में परिणत हो सकता है।

भारत के विनाशकारी महाभारत का युद्ध वाणी के गलत प्रयोग का ही परिणाम था। “मालिक, लुक़मान की बुद्धिमानी और चतुराई भरी बातों को सुनकर बहुत खुश हुए ; आज उनके गुलाम ने उन्हें एक बहुत बड़ी सीख दी थी और उन्होंने उसे आजाद कर दिया।

शिक्षा:-
मित्रों, मधुर वाणी एक वरदान है जो हमें लोकप्रिय बनाती है वहीँ कर्कश या तीखी बोली हमें अपयश दिलाती है और हमारी प्रतिष्ठा को कम करती है। आपकी वाणी कैसी है ? यदि वो तीखी है या सामान्य भी है तो उसे मीठा बनाने का प्रयास करिये। आपकी वाणी आपके व्यत्कित्व का प्रतिबिम्ब है, उसे अच्छा होना ही चाहिए।

16. प्रेरणादायी कहानियाँ ~ Moral Story

“उफ़! पापा जी आपने पूरा घर ही गन्दा कर दिया| अभी अभी राधा ने पोछा मारा था और आपने चप्पलों के निशान छोड़ दिए| थोड़ी तो समझ होनी चाहिए आपको? आप बच्चे तो हैं नहीं”|
बहू रिया के मुँह से ये शब्द सुनकर अनिल जी हतप्रभ से खड़े रह गए| कैसे पुलिस की नौकरी में सिर्फ उनकी एक आवाज बड़े से बड़े मुजरिमों को हिला कर रख देती थी और आज उनकी बहू उन्ही के घर में इतना सुना रही है| तभी पत्नी ने उन्हे सोफे पर बैठाते हुए कहा “कोई बात नहीं जी, बहू की बातों का क्या बुरा मानना? बस जुबान की तेज है, बाकी उसके मन में ऐसा कुछ नहीं है|”
अनिल जी ने पत्नी की आँखों में देखा जैसे पूछ रहे हों “सच में?” और फीकी सी हंसी उनके होठों पर तैर गई, लेकिन आँखों के कोर थोड़े से नम हो गये।

सोफ़े पर बैठे बैठे ही सोचने लगे कितने जतन से इस घर को खड़ा किया था| एक एक तिनका अपने हिसाब से रखवाया था इस घरौंदे का ताकि सेवा अवकाश के बाद पति पत्नी सुविधाओं के साथ आराम से रहेंगे| लेकिन आज सारी दुनिया उनके कमरे तक सिमट गई है| कमरे से बाहर निकलो तो कितना कुछ सुनना पड़ता था उन्हे, हॉल के अंदर फ़ायर पिट बनवाया था कि ठंड के दिनों में वहाँ आग के सामने भुनी मुँगफ़लियाँ खाएँगे| लेकिन मजाल क्या कि बहू कभी सर्दी में आग जलाने दे, कहती थी कि पूरे घर में राख के कण फैलते हैं फ़िर वो चिमनी वैसी ही रंगी पुती दिखती थी एक दम उजली क्योंकि बहू को वैसी ही पसंद थी|

ये सब सोच रहे थे तभी पत्नी हाथ में कॉफी का मग लिए वहाँ उनके पास आ बैठीं| पति को बहुत अच्छे से जानती थीं, जानती थीं कि वो अभी गुस्से में थे और उनके हाथ की कॉफी पीकर उनका गुस्सा शांत हो जाता था| पत्नी भी क्या करतीं, पति और बेटे सोमेश के मोह में फंसी एक भारतीय नारी जो ठहरी| दोनों तरफ़ बैलेंस बनाते बनाते ही उनका जीवन कट रहा था, कभी बेटे की सुनती कभी पति की।

एक दिन सुबह सैर से लौटने के बाद पति पत्नी दोनों लॉन में बैठे थे| नौकर चाय रख के गया, दो की जगह तीन चाय का कप उन्हे थोड़ा अटपटा लगा क्योंकि उनके आलावा चाय सिर्फ सोमेश पीता था और वो उनके साथ कभी चाय नहीं पीता था| उसने उनके साथ बैठना तो कब का छोड़ दिया था फ़िर आज?
तभी सोमेश वहाँ आ बैठा, साथ में चाय पीने लगा| लेकिन अजीब सी चुप्पी, ये वही सोमेश है जो छोटा था तो उसकी बातें ख़त्म ही नहीं होती थीं| अनिल जी कितना भी थके हों सोमेश के साथ खेलते ही थे| उसकी बातें तब तक ख़त्म नहीं होतीं जब तक कि वो उन्हे कहते कहते थक के सो नहीं जाता| आज अजीब सी औपचारिकता ने अपनी जगह बना ली थी बेटे और पिता के बीच।
तभी पत्नी ने उस खामोशी को तोड़ा,

“सोमेश अगले महीने ही तो रिया के भाई के बेटी की शादी है ना?”
“हाँ माँ, उसी बारें में बात करने आया हूँ| लड़के वाले इसी शहर के हैं और वो यहीं से शादी करना चाहते हैं| सो रिया का परिवार शादी के लिए ये घर चाहता है| वो हमारे घर से शादी करना चाहते हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि जब तक भीड़ भाड़ रहेगी घर में तब तक आप दोनों दीदी के पास चले जाओ| आप दोनों को भी भीड़ भाड़ से असुविधा होगी और दीदी भी इसी शहर में हैं तो आप लोगों को कोई तकलीफ़ भी नहीं होगी| आप दोनों का कमरा भी उनके काम आ जाएगा|”
ये सुनकर अनिल जी गुस्से से लाल हो गए, फ़िर भी अपनी आवाज को संयमित करके बोले “बहू के घर वालों को दूसरा घर दिला दो किराए पर, दस पंद्रह दिनों के लिए| हम क्यों शिफ्ट हों कहीं?”

“पापा आप भी ना गजब करते हो, रिया के घर वाले हैं| हमारे इतने बड़े घर के रहते उनके लिए दूसरा घर देखें! अब रिया ने उनसे कह भी दिया है| अब आप लोग अपना देख लो वो यहीं आएंगे|” कह कर सोमेश एक दम से अंदर चला गया| अंदर से बहू रिया की आवाज भी आने लगी| लग रहा था कि वो सब कुछ सुन रही थी और उसे अनिल जी की बात शायद अच्छी नहीं लगी थी।
आज पत्नी आँखों से आँसू बह रहे थे और अनिल जी ने उन्हे अपना कंधा दिया, जैसे कह रहे थे कि अभी मैं हूँ, सब ठीक कर दूँगा|
दूसरे दिन शाम अनिल जी सैर से आए तो पत्नी ने बताया कि बेटा, बहू और बच्चों के साथ छुट्टी बिताने अपने ससुराल गया और बिना बताये अनिल जी मुस्कुराने लगे और बोले “देख पगली, यही बच्चे होते जिनके लिए तू मुझसे लड़ती थी, जिनके लिए जाने कितनी रातें हमने जाग के बीता दीं| आज वो हमारे घर से हमें ही जाने को कह रहे हैं| कोई बात नहीं, मै भी इनका बाप हूँ” कहकर अंदर चले गए|
एक हफ़्ते बाद सोमेश परिवार के साथ लौटा तो दरवाजे पर ताला लगा था| चौकीदार बैठा उन्हे देखते ही उनके पास पहुँचा एक चाभी सोमेश के हाथों में दी और एक चिठ्ठी भी|
चिठ्ठी खोल कर पढ़ने लगा, वो ख़त अनिल जी का था सोमेश के नाम,
सोमेश,

मैं और तुम्हा री माँ रामेश्वरम जा रहे हैं| एक महीने बाद लौटेंगे, ये जो चाभी है तुम्हारे हाथ में वो घर की चाभी नहीं है| वो एक दूसरे फ्लैट की चाभी है जिसमें तुम सभी का सामान रखवा दिया है| वो फ्लैट मैंने बहुत पहले खरीदा था, तुम्हें नहीं बताया था| पॉश इलाके में है तुम लोगों के लिए अच्छा है, अगर अच्छा ना लगे तो अपने हिसाब से घर ले लेना।
ये घर मेरा और तुम्हारी माँ का है और हमारा ही रहेगा, इसमें से हमें कोई नहीं निकाल सकता| अभी तक सब कुछ बर्दाश्त करता रहा था क्योंकि तुम्हारी माँ खुश रहे| लेकिन अब तुम्हाेरी बातों से उसकी आँखों में आँसू आए ये मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता| ये हमारा सपनों का घर है जिसमें हम अपने बच्चों और नाती पोतों के साथ रहना चाहते थे, लेकिन शायद ईश्वर को ये मंजूर नहीं था और तुम लोगों को हमारा साथ पसंद नहीं था| वो घर मेरे और माँ के तरफ़ से तुम लोगों के लिए आशीर्वाद स्वरूप है| इच्छा होगी तो रखना वरना वापस कर देना, माता पिता होने के नाते हम अपना आत्मसम्मान नहीं खो सकते| हमारे बाद ये घर ट्रस्ट का होगा जो यहाँ वृद्ध आश्रम बनाएगे | इस घर पर तुम्हारा या तुम्हारी बहन का कोई अधिकार नहीं होगा, मैंने ये बात तुम्हारी बहन को भी बता दी है और वो मेरे इस फैसले से खुश है, उम्मीद है तुम भी होगे

Moral of the Story

घर दीवारों से नही, परिवार तथा रिश्तों से होता है। पुत्र अथवा पुत्रवधु होने के नाते यदि आपको सब अधिकार मिले हैं तो माता पिता की सेवा, उन्हें सुखी, स्वस्थ तथा आनंदित रखने का कर्तव्य भी आपका ही है

17. एक साहस है ~ Moral Story

सही मौके पर खड़े होकर बोलना “एक साहस है”..

उसी प्रकार खामोशी से बैठकर दूसरों को सुनना भी “एक साहस है”

सब बोलते है जिसको ज़बान है वो बोलता ही है, बोलने का ज्ञान सबको है, कोई व्यंग बोलता है, कोई प्यार से बोलता है, कोई गुस्सा करते बोलता है, कोई गाली भी बोलता है,

कब क्या बोलना है ये ज्ञान बहुत जरूरी है कभी भी कुछ भी बोल देने से शब्द की मर्यादा नहीं रहती और आपकी प्रतिष्ठा गिरती है, उचित शब्द स्नेह पूर्ण शब्द बोलना हर किसी के बस में नहीं है, जवान है तो सही उपयोग करो, छोटे से लेकर बड़ों तक क्या शब्द बोलना है ये बड़ा ज्ञान है।।

कितना भी कठिन समय हो, कैसी भी विषम परिस्थिति हो, खुद का धेरय्य रखे अच्छे शब्द का प्रयोग करे आप हर कठिनाई से निकाल जायेगे, बुरा अपशब्द बोले बाला खुद बुरा हो जाता है, एक बार जब आप बुरा बोलते है कोई प्रतिरोध नहीं करता तब आपको आदत में आ जाता है फिर आप चाह कर भी अच्छा नहीं बोल सकते,

जीवन ईश्वर ने दिया है, शब्द हमने उत्प्पन किए है, भाषा कोई भी हो अगर शब्द अच्छे है तो आप अच्छे है, कोई किसी को लेता देता नहीं है, बस एक शब्द है जो आप को सबसे जोड़ते है और तोड़ते है।।

Moral of the Story

कौआ काऊ काऊ करता है, कोयल कूक कुक करती है, आप को क्या क्या करना है आप पर निर्भर है,शिशु पाल सौ गाली के बाद मरा था, निषाद एक शब्द से स्नेही बने।।

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18. चिड़ियाघर का ऊंट ~ Moral Story

एक ऊंटनी और उसका बच्चा एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे.
बच्चे ने पूछा, “माँ, हम ऊँटों का ये कूबड़ क्यों निकला रहता है?”
“बेटा हम लोग रेगिस्तान के जानवर हैं, ऐसी जगहों पर खाना-पानी कम होता है, इसलिए भगवान् ने हमें अधिक से अधिक फैट स्टोर करने के लिए ये कूबड़ दिया है…जब भी हमें खाना या पानी नहीं मिलता हम इसमें मौजूद फैट का इस्तेमाल कर खुद को जिंदा रख सकते हैं.” ऊंटनी ने उत्तर दिया.
बच्चा कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, ” अच्छा, हमारे पैर लम्बे और पंजे गोल क्यों हैं?”
“इस तरह का आकार हम ऊँटों को रेत में आराम से लम्बी दूरी तय करने में मदद करता है,इसलिए.” माँ ने समझाया.
बच्चा फिर कुछ देर सोचता रहा और बोला, “अच्छा माँ ये बताओ कि हमारी पलकें इतनी घनी और लम्बी क्यों होती हैं?”
“ताकि जब तेज हवाओं के कारण रेत उड़े तो वो हमारी आँखों के अन्दर ना जा सके.” माँ मुस्कुराते हुए बोली.
बच्चा थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला,” अच्छा तो ये कूबड़ फैट स्टोर करने के लिए है… लम्बे पैर रेगिस्तान में तेजी से बिना थके चलने के लिए हैं… पलकें रेत से बचाने के लिए हैं…लेकिन तब हम इस चिड़ियाघर में क्या कर रहे हैं?”

दोस्तों, यही सवाल हमें खुद से पूछना चाहिए. ईश्वर ने हर एक इंसान को unique बनाया है. हर व्यक्ति में इतना potential है कि वह कुछ बड़ा… कुछ महान कर सकता है. लेकिन ज्यादातर लोग चिड़ियाघर का ऊंट बन जाते हैं… अपने अन्दर मौजूद अपार काबिलियत का प्रयोग ही नहीं करते… बेजुबान जानवर तो मजबूर है… लेकिन एक इंसान होने के नाते हमें मजबूर नहीं मजबूत बनाना चाहिए और अपने अन्दर के टैलेंट को पहचान कर अपनी बेस्ट लाइफ जीने की हर कोशिश करनी चाहिए..!!

18. कैसे साबित (proof) करें कि आत्मा 7 गुणों से युक्त है?

जिस प्रकार शरीर 5 तत्वों से मिलकर बना है पानी की कमी होने से प्यास लगती है,पानी की जगह घी , तेल या अन्य कोई तरल पदार्थ नहीं ले सकता, ऑक्सीजन की कमी से श्वांस बंद हो जाता,उसकी जगह इथेन ,मीथेन गैस नहीं ले सकते, पृथ्वी तत्व की कमी से भूख लगती…. आदि

इससे सिद्ध होता जो वस्तु जिन पदार्थों या घटकों से बनी है ,उसकी पूर्ति के लिए उन्हीं पदार्थों या घटकों की मांग (Demand) करती है।

⚜ उसी प्रकार आत्मा जब बहुत शोर शराबे में होती तब उसे शांति चाहिए होती है, तो कई लोग हिल स्टेशन जाते क्योंकि वहां शहर से अलग शांति मिलती है।

कोई अगर गुस्से में बात करता तो हम क्या कहते प्रेम से बात करने को , आत्मा ख़ुशी सुख साधनों में, रिश्तों में खोजती है।

आनंद की तलाश में आत्मा नशा करती, adventurous games , म्यूजिक, सांग्स सुनती है। तो इस तरह आत्मा में जब पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद, ज्ञान, शक्ति की कमी होने लगती तो वह उनकी मांग (Demand) करने लगती है।

इससे सिद्ध होता आत्मा उन सभी गुणों से मिलकर बनी है, गुणों से युक्त है।

19. जीवन का सत्य ~ Moral Story

एकबार पति-पत्नी ज्योतिष के पास पहुंचे और कहने लगे …
पति- आपने खुशहाल जीवन के लिए जो भी उपाय बताए सब किए, गृहस्थ जीवन में शांति के लिए पुखराज भी पहन लिया,
पत्नी- मानसिक शांति के लिए मोती भी आपके बताए अनुसार पहन लिया, पर अभी भी गृह-कलह मची रहती है, कोई प्रगति नही हो पा रही है …!

ज्योतिष ने गंभीरता से दोनो की ओर ऊपर से नीचे तक देखा और कहा-
“आपको जो बाहरी नग बताए वे तो आप दोनो ने पैसे खर्च कर पहन लिए, पर क्या आन्तरिक नग भी धारण किए…?”
यह सुनकर पति-पत्नी दोनो एक-दूसरे को और फिर ज्योतिष की ओर देखने लगे , फिर पति ने पूछा “आन्तरिक नग” !
ज्योतिष ने कहा- “हां ठीक सुना आप दोनो ने ! प्रेम, सेवा, सहनशीलता, विनम्रता, सद्भाव ऐसे गुण है, जो राशि-रत्न से भी अधिक प्रभावशाली होते हैं !”

20. जाना है भवपार ~ Moral Story

Hindi short stories with moral for kids

एक निर्धन विद्वान व्यक्ति चलते चलते पड़ोसी राज्य में पहुँचा। संयोग से उस दिन वहाँ हस्तिपटबंधन समारोह था जिसमें एक हाथी की सूंड में माला देकर नगर में घुमाया जाता था। वह जिसके गले में माला डाल देता था उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा बना दिया जाता था।

वह व्यक्ति भी समारोह देखने लगा। हाथी ने उसके ही गले में माला डाल दी। सभी ने जय जयकार करते हुए उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा घोषित कर दिया।

राजपुरोहित ने उसका राजतिलक किया और वहाँ के नियम बताते हुए कहा कि आपको केवल 5 वर्ष के लिए राजा बनाया जा रहा है। 5 वर्ष पूर्ण होते ही आपको मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नदी में छोड़ दिया जाएगा।

यदि आप में ताकत होगी तो आप उनका मुकाबला करके नदी के पार वाले गाँव में पहुँच सकते हो। आप को वापिस इस नगर में आने नहीं दिया जाएगा।

वह निर्धन विद्वान व्यक्ति तो सिहर गया पर उसने सोचा कि अभी तो 5 वर्ष का समय है। कोई उपाय तो निकल ही जाएगा।

उसने 5 वर्ष तक विद्वत्तापूर्वक राज्य किया। राज्य की संचालन प्रक्रिया को पूरे मनोयोग से निभाया और इस प्रकार केवल राज्य पर ही नहीं लोगों के दिलों पर भी राज्य करने लगा। जनता ने ऐसा प्रजावत्सल राजा कभी नहीं देखा था।

5 वर्ष पूर्ण हुए। नियमानुसार राजा को फिर से हाथी पर बैठाकर जुलूस निकाला गया।

लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। नदी के तट पर पहुँच कर राजा हाथी से उतरा। राजपुरोहित ने कहा कि अब आप नदी पार करके दूसरी ओर जा सकते हैं।

अश्रुपूरित विदाई समारोह के बीच उसने कहा कि मैं इस राज्य के नियमों का सम्मान करता हूँ। अब आप मुझे आज्ञा दें और हो सके तो इस निर्मम नियम में बदलाव करने के बारे में सोच विचार करें।

जैसे ही राजा ने नदी की ओर कदम बढाए, लोगों ने अपनी सजल आँखों को ऊपर उठाया। जानते हो वहाँ ऐसा क्या था जिसे देखकर वे खुशी से नाचने लगे?

उस नदी पर इस पार से उस पार तक राजा के द्वारा बनवाया गया एक पुल था जिस पर राजा शांत भाव से चला जा रहा था, नदी के उस पार वाले सुंदर से गाँव की ओर।………………….

क्या ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी घटित नहीं हो रहा?

हमें भी कुछ समय के लिए श्वासों की सम्पत्ति देकर इस अमूल्य जीवन की बागडोर सौंपी गई है

समय पूरा होते ही हमें यह राज्य छोड़ कर भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना है जहां से हमें फिर से इस राज्य में आने की आज्ञा नहीं है।

यदि हमने धर्म ध्यान का पुल नहीं बनाया तो हम मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नरकों में डाल दिए जाएंगे और उनका ग्रास बन जाएंगे।

और अगर हम शांत भाव से भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना चाहते हैं तो अभी से वह पुल बनाने की शुरूआत कर देनी चाहिए क्योंकि आयु काल पूरा होने के बाद जाना तो निश्चित ही है।

21.स्वार्थ छोडिये ~ Moral Story

एक छोटे बच्चे के रूप में, मैं बहुत स्वार्थी था, हमेशा अपने लिए सर्वश्रेष्ठ चुनता था। धीरे-धीरे, सभी दोस्तों ने मुझे छोड़ दिया और अब मेरे कोई दोस्त नहीं थे। मैंने नहीं सोचा था कि यह मेरी गलती थी और मैं दूसरों की आलोचना करता रहता था लेकिन मेरे पिता ने मुझे जीवन में मदद करने के लिए 3 दिन 3 संदेश दिए।

एक दिन, मेरे पिता ने हलवे के 2 कटोरे बनाये और उन्हें मेज़ पर रख दिया ।

एक के ऊपर 2 बादाम थे जबकि दूसरे कटोरे में हलवे के ऊपर कुछ नहीं था फिर उन्होंने मुझे हलवे का कोई एक कटोरा चुनने के लिए कहा क्योंकि उन दिनों तक हम गरीबों के घर बादाम आना मुश्किल था …. मैंने 2 बादाम वाले कटोरा को चुना!

मैं अपने बुद्धिमान विकल्प / निर्णय पर खुद को बधाई दे रहा था और जल्दी जल्दी मुझे मिले 2 बादाम हलवा खा रहा था परंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही था जब मैंने देखा कि की मेरे पिता वाले कटोरे के नीचे 8 बादाम छिपे थे!

बहुत पछतावे के साथ, मैंने अपने निर्णय में जल्दबाजी करने के लिए खुद को डांटा।

मेरे पिता मुस्कुराए और मुझे यह याद रखना सिखाया कि
आपकी आँखें जो देखती हैं वह हरदम सच नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि यदि आप स्वार्थ की आदत की अपनी आदत बना लेते हैं तो आप जीत कर भी हार जाएंगे

अगले दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए और टेबल पर रक्खे एक कटोरा के शीर्ष पर 2 बादाम और दूसरा कटोरा जिसके ऊपर कोई बादाम नहीं था।

फिर से उन्होंने मुझे अपने लिए कटोरा चुनने को कहा। इस बार मुझे कल का संदेश याद था इसलिए मैंने शीर्ष पर बिना किसी बादाम कटोरी को चुना परंतु मेरे आश्चर्य करने के लिए इस बार इस कटोरे के नीचे एक भी बादाम नहीं छिपा था! फिर से, मेरे पिता ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, “मेरे बच्चे, आपको हमेशा अनुभवों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी-कभी, जीवन आपको धोखा दे सकता है या आप पर चालें खेल सकता है स्थितियों से कभी भी ज्यादा परेशान या दुखी न हों, बस अनुभव को एक सबक अनुभव के रूप में समझें, जो किसी भी पाठ्यपुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

तीसरे दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए, एक कटोरा ऊपर से 2 बादाम और दूसरा शीर्ष पर कोई बादाम नहीं। मुझे उस कटोरे को चुनने के लिए कहा जो मुझे चाहिए था।

लेकिन इस बार, मैंने अपने पिता से कहा, पिताजी, आप पहले चुनें, आप परिवार के मुखिया हैं और आप परिवार में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं । आप मेरे लिए जो अच्छा होगा वही चुनेंगे।

मेरे पिता मेरे लिए खुश थे ।
उन्होंने शीर्ष पर 2 बादाम के साथ कटोरा चुना, लेकिन जैसा कि मैंने अपने कटोरे का हलवा खाया! कटोरे के हलवे के एकदम नीचे 2 बादाम और थे।

मेरे पिता मुस्कुराए और मेरी आँखों में प्यार से देखते हुए, उन्होंने कहा मेरे बच्चे, तुम्हें याद रखना होगा कि जब तुम भगवान पर छोड़ देते हो, तो वे हमेशा तुम्हारे लिए सर्वोत्तम का चयन करेंगे जब तुम दूसरों की भलाई के लिए सोचते हो, अच्छी चीजें स्वाभाविक तौर पर आपके साथ भी हमेशा होती रहेंगी ।

Moral Story for Adults

22. हाथी का विश्वास ~ Moral Story

एक सज्जन एक हाथी-शिविर से गुजर रहे थे और उन्होंने देखा कि हाथी को पिंजरों में नहीं रखा जा रहा है और ना ही जंजीरों के इस्तेमाल से रखा गया है।

जो सभी उन्हें शिविर से भागने से रोक रहे थे, वह उनके पैरों में बंधी रस्सी का एक छोटा सा टुकड़ा था।

जैसा कि आदमी ने हाथियों पर ध्यान दिया, वह पूरी तरह से उलझन में था कि हाथियों ने रस्सी को तोड़ने और शिविर से बचने के लिए अपनी ताकत का उपयोग क्यों नहीं किया। वे आसानी से ऐसा कर सकते थे, लेकिन इसके बजाय, उन्होंने बिल्कुल भी कोशिश नहीं की।

जिज्ञासु और जवाब जानने के लिए, उन्होंने पास के एक महावत से पूछा कि हाथी सिर्फ वहां क्यों खड़े थे और कभी भागने की कोशिश नहीं की।

महावत ने जवाब दिया;

इस बिंदु पर जब वे बेहद युवा होते हैं और बहुत छोटे होते हैं, हम उन्हें एक समान आकार की रस्सी का उपयोग करते हैं ताकि उन्हें उस उम्र में संलग्न किया जा सके।

 जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उन्हें विश्वास होता है कि वे टूट नहीं सकती। उनका मानना ​​है कि रस्सी अभी भी उन्हें पकड़ सकती है, इसलिए वे कभी भी मुफ़्त तोड़ने की कोशिश नहीं करते हैं।

हाथियों के मुक्त होने और शिविर से भागने का एकमात्र कारण यह था कि समय के साथ उन्होंने यह विश्वास अपनाया कि यह अभी संभव नहीं था।

शिक्षा:-
कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया आपको वापस पकड़ने की कितनी कोशिश करती है, हमेशा इस विश्वास के साथ जारी रखें कि आप क्या हासिल करना चाहते हैं। यह मानना ​​कि आप सफल हो सकते हैं वास्तव में इसे प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

23. धैर्य से सफलता ~ Moral Story

एक नवयुवक एक महान तपस्वी संत के पास योगविद्या सीखने गया।गुरू जी ने कहा, ‘मैं तुम्हें एक शर्त पर योग विद्या सिखाऊंगा और वह यह कि तुम मेरे लिए एक छोटी-सी साधना कुटिया का निर्माण करो तब।’युवक ने शीघ्र ही एक कुटिया का निर्माण कर दिया। गुरू जी ने कुटिया को देखा और कहा कि इसको तोड़कर फिर से नई कुटिया का निर्माण करो। युवक ने फिर से नई कुटिया का निर्माण किया। गुरू जी ने कुटिया को देखा और फिर से कहा कि इसको तोड़कर नई कुटिया का निर्माण करो। यह क्रम चलता ही गया। आखिर में जब ग्यारहवीं बार गुरू ने कुटिया को तोड़कर नई कुटिया का निर्माण करने का आदेश दिया।
युवक भी बिना कोई प्रश्न किए ग्यारहवीं बार भी कुटिया बनाने के लिए तैयारी करने लगा, तब गुरू के मुख से शब्द निकले, ‘साधु…साधु… हे नवयुवक तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हुई।
एक साधक को सीखने के लिए जो स्थिति बनानी चाहिए, वह तुम्हारी बन चुकी है और तुम बुद्धि से भी पूर्ण रूप से समर्पित और धैर्यता से सफल हुए हो। अगर तुम्हारे अन्दर जरा-सा भी अपनी बुद्धिमता का अहंकार होता, तो तुम यहां टिक नहीं सकते थे, परन्तु तुमने अपनी अवस्था को बिल्कुल निर्विकल्प रखा, जिसके फलस्वरूप तुम्हारी विजय हुई।’
हमारे जीवन में भी हमें सिखाने के लिए कई प्रकार की समस्याएं, बाधाएं और विपदाएं आती हैं। हमें सदा धैर्य पूर्वक उनका सामना करना चाहिए। याद रखें, जो व्यक्ति जीवन में धैर्य व बौद्धिक स्तर से अहंकारहीनता के गुण को धारण करता है, वह अवश्य ही सफलता को प्राप्त करता है।

24. अधूरी भक्ति…….. ~ Moral Story

एक छोटे से गाँव में साधू रहता था, वहाँ हर वक्त कान्हा के स्मरण में लगा रहता था, वहाँ कान्हा के लिए रोज_ खीर_चावल बनाता था, और हर दिन उनकें इंतजार में आस लगाए बैठा रहता था, कि मेरे कान्हा कब आयेंगे,
उस साधू की एक बुरी आदत थी, वहाँ गाँव में रहने वाले नीची जाती के लोगो से दूर रहता था, उन्हें आश्रम में नही आने देता था, उसका मानना था, कान्हा इससे नाराज हो जाएंगे, वो तो स्वामी हैं, इन नीच छोटी जाति वालों के, आश्रम में प्रवेश करने से और मुजे दर्शन नही देंगे, इसलिए वहाँ कभी किसी से ठीक से बात नही करता था………..🌳

उसके आश्रम से थोड़ी दूर एक कोड़ी रहता था, वहाँ भी कान्हा का भक्त था, नित्य प्रतिदिन वहाँ उनकी उपासना करता था, और हर वक्त कान्हा की भक्ति में डूबा रहता था,
जब भी साधू, उसके घर के पास से गुजरता तो कोड़ी को कहता नीच तुज जैंसे कोड़ी से कान्हा क्या मिलने आयेंगे, वो तो स्वामी हैं, तुज जैंसे के घर में क्यूं आने लगें भला, और बोलते_बोलते वहाँ आश्रम चले जाता……….🌿

कुछ वर्ष व्यतित हुये, अब साधू को लगने लगा, कान्हा क्यूं मुजे दर्शन नही दे रहे, और साधू उसकी मूर्ति के सामने रोने लगा, और कहने लगा प्रभु एक बार तो मुजे दर्शन दें दो, मैं प्रतिदन आपके लिए खीर_चावल बनाता हूं, एक बार तो आ कर भोज लगा लें, और उदास होकर कान्हा के चरणों में सो गया………🌴

दूसरे दिन एक गरीब दरिद्र, छोटा सा बालक साधू के आश्रम आया, साधू उस वक्त कान्हा को भोग लगाने जा रहा था, उस बालक ने कहा, साधू महराज मुजे कुछ खाने दे दीजिए मुजे जोरो की भूख लगी हैं,
साधू गुस्सें से तिलमिला गया, एक तो दरिद्र और दूसरा कान्हा की भक्ति में विध्न, उसने आव देखा ना ताव, एक पत्थर उठाकर बच्चें को दे मारा, उस दरिद्र बच्चें के सर से खून निकलने लगा, साधू ने कहा भाग यहाँ सें, बच्चा उसके आश्रम से निकल गया,
और जाकर उस कोडी के घर में चला गया, कोड़ी ने उसके रक्त साफ किया पट्टी बाँधी और उस भूखें बच्चें को भोजन दिया, बच्चा भोजन कर के चला गया……….🌱

दूसरे दिन फिर वो बच्चा साधू के आश्रम आया, साधू ने फिर उसे मारा और भागा दिया, फिर वहाँ कोड़ी के घर चला गया, कोड़ी ने फिर उसकी पट्टी बाँधी और खाने को दिया, बच्चा खाना खाकर चला जाता……🌳

वो बच्चा रोज आता, साधू उसे मारता और वो कोड़ी के पास चला जाता,
एक दिन साधू स्नान के लिए जा रहा था, उसे रास्तें पर वही कोड़ी दिखा, साधू ने उसे देखा तो अश्चाचर्य से भर गया, उस कोड़ी का कोड़ गायब हो चुका था, वहाँ बहुत ही सुंदर पुरूष बन चुका था, साधू ने कोड़ी नाम लेकर कहा, तुम कैंसे ठीक हो गयें, कोड़ी ने कहा, मेरे कान्हा की मर्जी, पर साधू को रास नही आया, उसने मन ही मन फैसला किया, पता लगाना पड़ेगा………..🌾

दूसरे दिन फिर वहाँ दरिद्र बच्चा साधू के आश्रम आया, साधू ने फिर उसे मारा, बच्चा जाने लगा, तो साधू उठ खड़ा हुआ और मन ही मन सोचने लगा, मैं इस दरिद्र बच्चें को रोज मारता हूं, ये रोज उस कोड़ी के घर जाता हैं, आखिर चक्कर क्या हैं देखना पड़ेगा, साधू पीछे_पीछे जाने लगता हैं जैसें ही वहाँ कोड़ी की झोपड़ी में पहुंचता हैं, उसकी ऑखें फटी की फटी रह जाती हैं…………🌳

स्वंय तीनो लोक के स्वामी कान्हा बांके बिहारी कोड़ी के घर पर बैंठे हैं और कोड़ी उनकी चोट पर मलहम लगा रहा हैं, और कान्हा जी भिक्षा में मांगी ना जाने कितनो दिनों की भासी रोटी को बड़े चाव से खा रहें हैं,

साधू कान्हा चरणों गिरते कहने लगा, मेरे कान्हा मेरे स्वामी मेरे आराध्य आपने मुज भक्त को दर्शन नही दिये, और इस नीच को दर्शन दे दीये, मुजसे क्या गलती हो गयी, जो आप इस कोड़ी की झोपड़ी में आ गयें, भिख में मांगी भासी रोटी खा ली पर, मैं आपके नित्य प्रतिदिन खीर_चावल बनाता हूं उसे खाने नही खाए, बोलो कान्हा बोलो…….🌾

तब कान्हा जी ने कहा ये साधू, मैं तो रोज तेरे पास खाना मांगने आता था, पर तु ही रोज मुजे पत्थर से मारकर भागा देता था, मुजे भूख लगती थी, और मैं इतना भूखा रहता था, की इस मानव के घर चला आता था, वो जो मुजे प्यार से खिलाता मैं खाकर चला जाता, अब तु ही बता इसमें मेरी क्या गलती,,,,,,,,,,,,
साधू पैर पकड़ कान्हा के रोने लगता हैं और कहता हैं, मुजसे गलती हो गयी, मैं आपको पहचान नही पाया, मुजे माफ कर दिजिए, और फिर कहता हैं, तीनो लोक के स्वामी गरीब भिखारी दरिद्र बच्चा बनकर आप मेरे आश्रम क्यूं आते थे, मैं तो आपको दरिद्र समझकर मारता था, क्यूकि मेरे कान्हा तो स्वामी हैं वो दरिद्र कैसें हो सकते हैं………🌴

कान्हा जी ने कहा,
हे साधू, तुजे किसने कहा मैं सिर्फ महलों में रहता हूं,
तुजे किसने कहा, मैं सिर्फ 56 भोज खाता हूं,
तुजे किसने कहा मैं, नंगे पैर नही आता,
तुजे किसने कहा
मैं दरिद्र नही,
हे साधू, ये समस्त चरचरा मैं ही हूं, धरती आकाश पृथ्वी सब मैं ही हूं, मैं ही हूं महलों का स्वामी, तो मैं ही हूं झोपड़ी का दरिद्र भिखारी, मैं ही हूं जो प्यार और सच्ची श्राध्दा से खिलाने पर बासी रोटी खा लेता हैं और स्वार्थ से खिलाने पर 56 भोग को नही छूता, मैं हर जीव में बसा हूं, तु मुजे अमीर_गरीब में ढूंढता हैं……………🌴

तुजसे अच्छा तो ये कोड़ी हैं जो सिर्फ एक ही बात जानता हैं, ईश्वर हर किसी में निवास करते हैं ना की धनवान में,
कान्हा कहने लगे,
तुने मेरी भक्ति तो की पर अधूरी
और कान्हा अंन्तरधय्न हो जाते हैं…………🌳

साधू उनकी चरण बज्र पकड़ फूटफूटकर रोने लगता हैं और कहता हैं जिसका एक पल पाने के लिए लोग जन्मोंजन्म तप करते है वो मेरी कुटिया में भीख मांगने आता था और मैं मूर्ख दरिद्र समपन्न देखता था,,,,
और कोड़ी के पैर पकड़ कहता हैं,,,,,,
मैंने तो सारी जिंदगी अधूरी भक्ति की,,,,,,
आप मुजे सच्ची भक्ति के पथ पर ले आइयें, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए, कोड़ी उसे गले लगा लेता हैं……… 🙏

क्यूकि किसी ने कहा हैं वो भिख लेने बस नही, दुआ देने भी आता हैं, और किसी महान आदमी ने कहा हैं,,,,,
दानें_दानें पर लिखा हैं खाने वालें का नाम

इसलिए कभी किसी का अनादर मत कीजिए

बच्चों के लिए प्रेरणादायक कहानियाँ

25. बालक और उसकी ईमानदारी !! ~ Moral Story

Hindi Moral Story for class 5 student: एक छोटे से गांव में नंदू नाम का एक बालक अपने निर्धन माता पिता के साथ रहता था। एक दिन दो भाई अपनी फसल शहर में बेचकर ट्रैक्टर से अपने गांव आ रहे थे। फसल बेचकर जो पैसा मिला वो उन्होंने एक थैली में रख लिया था। अचानक एक गड्डा आ गया और ट्रैक्टर उछला और थैली नीचे गिर गई । जिसे दोनों भाई देख नहीं पाएं और सीधे चले गए। बालक नंदू खेलकूद पर रात के अंधेरे में अपने घर जा रहा था।

अचानक उसका पैर किसी वस्तु से टकरा गया। देखा तो पता चला कि किसी की थैली है। जब नंदू ने उसे खोलकर देखा तो थैली में नोट भरे हुए थे। वो हैरान हो गया। वह सोचने लगा की पता नहीं किसकी थैली है। उसने सोचा कि अगर यही छोड़ गया तो कोई और इसे उठा ले जाएगा। वो मन ही मन सोचने लगा ‘जिसकी यह थैली है उसे कितना अधिक दुख और कष्ट हो रहा होगा।

हालाँकि लड़का उम्र से छोटा था और निर्धन माँ बाप का बेटा था। लेकिन उसमे सूझबूझ काफी अच्छी थी। वह थैली को उठाकर अपने घर ले आया। उसने थैली को झोपड़ी में छुपा कर रख दिया। फिर वापस आकर उसी रास्ते पर खड़ा हो गया उसने सोचा। कोई रोता हुआ आएगा तो पहचान बताने पर उसे थैली दे दूंगा। इधर जब थोड़ी देर बाद दोनों भाई घर पहुंचे तो ट्रैक्टर में थैली नहीं थी । दोनों भाई यह जान निराश होते हुए बहुत दुखी होने लगे। पूरे साल की कमाई थैली में भरी थी।

किसी को मिला भी होगा तो कोई बताएगा भी नहीं। शायद अभी वह किसी के हाथ ना लगा हो यह सोच दोनों भाई टॉर्च लेकर उसी रास्ते पर वापस र चले जा रहे थे। छोटा बालक नंदू उन्हें रास्ते में मिला। उसने उन दोनों से कुछ भी नहीं पूछा। लेकिन उसे शंका हुई की शायद वह थैली इन्हीं की हो। उसने उनसे पुछा ‘आप लोग क्या ढूंढ रहे हैं? उन्होंने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने दुवारा पूछा ‘आप दोनों क्या ढूढ़ रहा हो। उन्होंने कहा? अरे कुछ भी ढूंढ रहे हैं तू जा तुझे क्या मतलब।

दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे। नंदू उनके पीछे चलने लगा। वो समझ गया था कि नोटों वाली थैली संभवत इन्हीं की ही है। उसने तीसरी बार फिर पूछा, तो चिल्लाकर एक भाई ने कहा ‘अरे चुप हो जा और हमें अपना काम करने दे। दिमाग को और खराब ना कर। अब नंदू को पूरा विश्वास हो गया कि वे थैली अवश्य ही इन्हीं की ही है। उसने फिर पूछा ‘आपकी थैली खो गई है क्या ? दोनों भाई एकदम रुक गए और बोले हां। नंदू बोला ‘पहले थैली की पहचान बताइए।

जब उन्होंने पहचान बताई तो बालक उन्हें अपने घर ले गया। टोकरी में रखी थैली उन दोनों भाइयों को सौंप दी। दोनों भाइयों के प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। नंदू की इमानदारी पर दोनों बड़े हैरान थे। उन्होंने इनाम के तौर पर कुछ रुपए देने चाहे, पर नंदू ने मना कर दिया बोला ‘यह तो मेरा कर्तव्य था। दूसरे के दिन वह दोनों भाई नंदू के स्कूल पहुंच गए। उन्होंने बालक के अध्यापक को यह पूरी घटना सुनाते हुए कहा, हम सब विद्यार्थियों के सामने उस बालक को धन्यवाद देने आए।

अध्यापक के नेत्रों से आंसू झरने लगे। उन्होंने बालक की पीठ थपथपाई और पूछा ‘बेटा, पैसे से भरे थैले के बारे में अपने माता पिता को क्यों नहीं बताया ? नंदू बोला, गुरूजी मेरे माता-पिता निर्धन हैं । कदाचित उनका मन बदल जाता तो हो सकता है रुपयों को देख कर उसे लौटने नहीं देते और यह दोंनो भाई बहुत निराश हो जाते। यह सोच मैंने घरवालों को थैली के बारे में कुछ भी नहीं बताया। सभी ने नंदू की बड़ी प्रशंसा की और कहा बेटा। धन्यवाद गरीब होकर भी तूने ईमानदारी को नहीं छोड़ा।

शिक्षा:-
इस कहानी का सार यही है कि सबसे बड़ा गुण इमानदारी का है। ईमानदार होना हमें सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की स्थिति में ले जाता है। जिस प्रकार इस छोटे से बालक ने अपने ईमान को नहीं खोया भले ही उसकी गरीबी के लिए कष्टदाई थी। लेकिन ईमानदारी व्यक्ति छोटा हो या बड़ा ईमानदारी का गुण ही जीवन के सबसे बड़े गहने हैं। ईमानदारी से ही हमारे व्यक्तित्व को बहुत ही प्रसिद्धि मिलती है। ईमानदार मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है।

26. भोजन के प्रकार ~ Moral Story

Hindi short story with moral for kids – बच्चों के लिए छोटी कहानियां

भीष्म पितामह ने गीता में अर्जुन को 4 प्रकार से भोजन करने के लिए बताया था।

👉🏿1) #पहला भोजन- जिस भोजन की थाली को कोई लांघ कर गया हो वह भोजन की थाली नाले में पड़े कीचड़ के समान होती है।

👉🏿2) #दूसरा भोजन- जिस भोजन की थाली में ठोकर लग गई ,पाव लग गया वह भोजन की थाली भिष्टा के समान होता है।

👉🏿3) #तीसरे प्रकार का भोजन -जिस भोजन की थाली में बाल पड़ा हो, केश पड़ा हो वह दरिद्रता के समान होता है।

👉🏿4)#चौथे नंबर का भोजन -अगर पति और पत्नी एक ही थाली में भोजन कर रहे हो तो वह मदिरा के तुल्य होता है और सुनो अर्जुन अगर पत्नी ,पति के भोजन करने के बाद थाली में भोजन करती है उसी थाली में भोजन करती है या पति का बचा हुआ खाती है तो उसे चारों धाम के पुण्य का फल प्राप्त होता है ।चारों धाम के प्रसाद के तुल्य वह भोजन हो जाता है।

और सुन अर्जुन- बेटी अगर कुमारी हो और अपने पिता के साथ भोजन करती है एक ही थाली में ,, उस पिता की कभी अकाल मृत्यु नहीं होती ,क्योंकि बेटी पिता की अकाल मृत्यु को हर लेती है ।इसीलिए बेटी जब तक कुमारी रहे तो अपने पिता के साथ बैठकर भोजन करें। क्योंकि वह अपने पिता की अकाल मृत्यु को हर लेती हैं।

Moral Story in Hindi for Students

27. दो पत्थरों की कहानी !! ~ Moral Story

Hindi Moral Story for class 1 student: नदी पहाड़ों की कठिन व लम्बी यात्रा के बाद तराई में पहुंची। उसके दोनों ही किनारों पर गोलाकार, अण्डाकार व बिना किसी निश्चित आकार के असंख्य पत्थरों का ढेर सा लगा हुआ था। इनमें से दो पत्थरों के बीच आपस में परिचय बढ़ने लगा। दोनों एक दूसरे से अपने मन की बातें कहने-सुनने लगे। इनमें से एक पत्थर एकदम गोल-मटोल, चिकना व अत्यंत आकर्षक था जबकि दूसरा पत्थर बिना किसी निश्चित आकार के, खुरदरा व अनाकर्षक था।

एक दिन इनमें से बेडौल, खुरदरे पत्थर ने चिकने पत्थर से पूछा, ‘‘हम दोनों ही दूर ऊंचे पर्वतों से बहकर आए हैं फिर तुम इतने गोल-मटोल, चिकने व आकर्षक क्यों हो जबकि मैं नहीं?’’

यह सुनकर चिकना पत्थर बोला, “पता है शुरुआत में मैं भी बिलकुल तुम्हारी तरह ही था लेकिन उसके बाद मैं निरंतर कई सालों तक बहता और लगातार टूटता व घिसता रहा हूं… ना जाने मैंने कितने तूफानों का सामना किया है… कितनी ही बार नदी के तेज थपेड़ों ने मुझे चट्टानों पर पटका है…तो कभी अपनी धार से मेरे शरीर को काटा है… तब कहीं जाकर मैंने ये रूप पाया है।

जानते हो, मेरे पास हमेशा ये विकल्प था कि मैं इन कठनाइयों से बच जाऊं और आराम से एक किनारे पड़ा रहूँ…पर क्या ऐसे जीना भी कोई जीना है? नहीं, मेरी नज़रों में तो ये मौत से भी बदतर है!

तुम भी अपने इस रूप से निराश मत हो… तुम्हें अभी और संघर्ष करना है और निरंतर संघर्ष करते रहे तो एक दिन तुम मुझसे भी अधिक सुंदर, गोल-मटोल, चिकने व आकर्षक बन जाओगे।

मत स्वीकारो उस रूप को जो तुम्हारे अनुरूप ना हो… तुम आज वही हो जो मैं कल था…. कल तुम वही होगे जो मैं आज हूँ… या शायद उससे भी बेहतर!”, चिकने पत्थर ने अपनी बात पूरी की।

शिक्षा:-
दोस्तों, संघर्ष में इतनी ताकत होती है कि वो इंसान के जीवन को बदल कर रख देता है। आज आप चाहे कितनी ही विषम पारिस्थति में क्यों न हों… संघर्ष करना मत छोड़िये…. अपने प्रयास बंद मत करिए. आपको बहुत बार लगेगा कि आपके प्रयत्नों का कोई फल नहीं मिल रहा लेकिन फिर भी प्रयत्न करना मत छोडिये। और जब आप ऐसा करेंगे तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो आपको सफल होने से रोक पाएगी।

28. अपना दीपक खुद बनो !! ~ Moral Story

Hindi short story with moral for kids – बच्चों के लिए छोटी कहानियां

Hindi Moral Story for class 1 student: यह कहानी भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को सुनाई थी- एक बार की बात है, दो यात्री धर्मशाला में ठहरे हुए थे। सांझ का समय था और वहां पर दीये बेचने वाला एक कुम्हार आया। एक यात्री ने उससे दीया खरीद लिया। वहीं, दूसरे ने सोचा कि, इसने अपने लिए खरीद लिया है तो मैं भी इसके साथ ही चल पडूंगा, तो मुझे पैसा खर्च करके अलग दीया खरीदने की क्या जरूरत है।

कुछ देर बाद अपना दीया जलाकर पहला यात्री रात में अपने अगले ठिकाने की ओर चल पड़ा, दूसरा भी उसके साथ निकल पड़ा। थोड़ी दूर चलने पर दीया खरीदने वाला यात्री एक ओर मुड़ गया। लेकिन, दूसरे यात्री को विपरीत दिशा में जाना था। इसलिए वह वहीं रह गया और दीया न होने के कारण बिना उजाले किसी भी दिशा में आगे नहीं जा पाया।

कहानी का सबक – महात्मा बुद्ध ने कहा कि- भिक्षुओं! अपना दीपक खुद बनो। आपके कार्य ही आपका दीपक हैं, वही आपको मार्ग दिखाएंगे।

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